Saturday, 21 May 2022

काव्य:कुर्सी

कुर्सी

शब्द दो अक्षरों से भरा,
बोलते है,पावर आवे,
मैं उपर आसमां नीचे,
ए आवारगी दिल मैं छाये,
तन मन मैं सत्ता का घमंड आवे,मैं कुछ सब तुच्छ ए घटिया सोच मन दिल मैं कब्जा कर गई,जीतना बहार निकले इतना अंदर घुसता रहुं,कुर्सी तेरे होते मैं खुद को महेफूस समजु,तेरे खोनै का डरने मुझे बावरा सा कर दिया,मेरी नींद चेन चुरा रखा हे
है,प्यारी कुर्सी तुने....


शैमी ओझा "लफ्ज़"

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