Friday, 27 May 2022

काव्य:मैं हर स्त्री के मन की बात हुँ।

मै हर स्त्री के मन की बात हुँ...  ऐ दस्तूर बडा कमाल का है सब शास्त्रों वैदो के नाम मेँ भेंट चड जाउँ मे हर स्त्री के मन की बात हु।  समाज बेटी पढावो का परचम लहराकर हर रिति रिवाज के नाम  अपने सपने आँसु मे बहा दैने वाली नदी  हुँ, मे हर स्त्री के मन की बात हुँ।  प्यार किसी और से शादी किसी ओर से, दिल के जस्बातो को  समजाने की आदत सी  हो गई हैं,पर ईस बेचैन से दिल का क्या? मेँ इज्ज़त के नाम पर कुरबान हुई  हर स्त्री के मन की बात हुँ।  नवरात्रि बहुत प्यारा त्योहार हैं, नौ दैवी ओकी पूजा तो बडी भक्तिभाव से  की करने वाले अपनी ही बेटी और पत्नी को घरों गालीगलौज करने वालों की कोई कमी नहीं, मे घरेलू हिंसासे पिडित हर स्त्री के मन की बात हुँ।  बेटी बचाओ बेटी बचाओ का नारा लगातार, बडी बडी डिन्गे मारने वाले मैंने बहुत दैखे है, बेटो की चाहत के गर्भ मेँ मार दी गई हुई  हर,बेटी की चित्कार हुँ,मेँ स्त्री के मन की बात हुँ।  मां कहेती है तुम घर कि इज्ज़त खराब मत करो, बेटो को नहीं कहा जाता कि तुम किसिकी ईज्जत  से साथ खेला न करो,हवस का शिकार बनी हुई स्त्री के मन की बात हुँ।  ए दस्तुर बडा कमाल का है, सब वैदो शास्त्रों के नाम मेँ भेट चड जाउँ, मेँ वो हर स्त्री के मन की बात हुँ।         शैमी ओझा "लफ्ज़"

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પ્રાશ્ચિત

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